नदी की धार..
* डॉ. इंद्रकुमार विश्वकर्मा
नदी हूं
धीरे-धीरे बहती
अपने ही किनारों से टकराती
मौन की चादर ओढ़े!
मैंने देखा है तुझे
दूर किसी शिला पर एकांत..
बारिश-सा भीगता..
ख़ामोश
संवाद की तरह
तेरी नज़र
मुझसे बात करती है
मगर
कोई पुल नहीं बनता
नहीं जुड़ पाते दोनों किनारे!
मेरे भीतर
ज़िम्मेदारियों का अरण्य
जिसमें उलझे हैं
परिवार के बूटे
हर शाख से लिपटे हैं
समाज के नियम
जो मेरे बहने की गति को
थाम लेते हैं!
तू आवाज़ देता है
उस पार के खुले
मैदान में बुलाता है
लेकिन न चाहते हुए भी
मुझे लौटना है
अपने ही वन
अपने कुनबे के बीच!
बहाव की दिशा
नदी स्वयं
निर्धारित नहीं करती
बंधन की मिट्टी
उसकी गहराई बनाती है
चढ़ाव-उतार
उसकी दिशा निर्धारित करते हैं!
हम दोनों
क्षितिज की
दो परछाइयाँ
जो धीरे-धीरे
एक दूसरे में
धुंधला जाती हैं!
प्रेम..
सिर्फ बहाव रह जाता है
अपूर्ण..
सजल..
किंतु फिर भी
सुंदर!


















